SEBI Expense Ratio Rules: म्यूचुअल फंड निवेशकों के लिए क्या बदला?

SEBI ने 17 दिसंबर 2025 की बोर्ड मीटिंग में म्यूचुअल फंड्स के खर्च ढांचे (Expense Framework) में बड़ा बदलाव किया है। इसका सीधा लाभ लंबे समय के निवेशकों को पारदर्शिता और लागत में कमी के रूप में मिल सकता है।

नया Expense Ratio ढांचा क्या है?

अब बेस एक्सपेंस रेशियो में केवल वे खर्च शामिल होंगे जो सीधे स्कीम मैनेजमेंट से जुड़े हैं, जैसे फंड मैनेजर की फीस, डिस्ट्रीब्यूटर कमीशन, RTA चार्ज आदि।

स्टैच्यूटरी और रेगुलेटरी लेवी जैसे STT, GST, स्टाम्प ड्यूटी, SEBI फीस और एक्सचेंज फीस को बेस एक्सपेंस रेशियो से बाहर कर दिया गया है, ये अलग दिखाए जाएंगे।

कुल खर्च (Total Expense Ratio – TER) अब तीन हिस्सों का जोड़ होगा:

  1. बेस एक्सपेंस रेशियो
  2. ब्रोकरेज
  3. रेगुलेटरी और स्टैच्यूटरी लेवी

इससे निवेशकों को यह साफ दिख सकेगा कि वास्तव में फंड मैनेजमेंट की कितनी लागत है और टैक्स/ट्रांजैक्शन चार्ज कितने हैं।

नई लिमिट्स: इंडेक्स फंड और ETF

इंडेक्स फंड्स और ETFs के लिए बेस एक्सपेंस रेशियो की ऊपरी सीमा पहले 1.00% थी, जिसे घटाकर 0.90% किया गया है।

पासिव प्रोडक्ट्स का उद्देश्य सस्ता और सरल एक्सपोजर देना है, ऐसे में यह कटौती निवेशकों के लिए लाभदायक है क्योंकि लंबे समय में 10–20 बेसिस पॉइंट की बचत भी कंपाउंड होकर बड़ा अंतर ला सकती है।

Fund of Funds के लिए बदलाव

FoFs पर भी SEBI ने सीमाएं कम की हैं, अलग–अलग श्रेणियों के लिए अलग नई लिमिट तय हुई है:

  • जो FoFs लिक्विड फंड, इंडेक्स फंड या ETFs में निवेश करते हैं: लिमिट 1.00% से घटकर 0.90% हो गई है।
  • जो FoFs 65% से अधिक इक्विटी स्कीमों में निवेश करते हैं: लिमिट 2.25% से 2.10% कर दी गई है।
  • अन्य FoFs के लिए लिमिट 2.00% से घटाकर 1.85% की गई है।

FoFs में पहले से ही दो स्तर के खर्च (अंडरलाइंग फंड + FoF) लगते हैं, इसलिए ये कटौती निवेशकों की कुल लागत को कुछ हद तक नियंत्रित करेगी।

ओपन-एंडेड इक्विटी व नॉन-इक्विटी स्कीमों पर असर

ओपन-एंडेड स्कीमों के लिए SEBI ने AUM स्लैब के हिसाब से एक्सपेंस रेशियो की लिमिट घटाई है। AUM जितना बढ़ेगा, औसत लागत उतनी कम होनी चाहिए – इस सिद्धांत को और मजबूत किया गया है।

मुख्य बिंदु:

इक्विटी-ओरिएंटेड स्कीमों के लिए:

  • ₹500 करोड़ तक के AUM पर सीमा 2.25% से घटाकर 2.10% की गई है।
  • ₹50,000 करोड़ से अधिक AUM पर लिमिट 1.05% से घटाकर 0.95% की गई है।

नॉन-इक्विटी (डेट/हाइब्रिड आदि) स्कीमों के लिए:

  • ₹500 करोड़ तक AUM पर सीमा 2.00% से 1.85% की गई है।
  • ₹50,000 करोड़ से अधिक AUM पर लिमिट 0.80% से घटाकर 0.70% की गई है।

मतलब, बड़े AUM वाली स्कीमों से उम्मीद की जाएगी कि वे स्केल का फायदा निवेशकों को कम खर्च के रूप में पास ऑन करें।

क्लोज-एंडेड स्कीमों के लिए नई सीमा

क्लोज-एंडेड फंड्स में भी एक्सपेंस कैप कम किए गए हैं:

  • इक्विटी-ओरिएंटेड क्लोज-एंडेड स्कीम: लिमिट 1.25% से घटाकर 1.00%।
  • नॉन-इक्विटी क्लोज-एंडेड स्कीम: लिमिट 1.00% से घटाकर 0.80%।

क्लोज-एंडेड स्कीमों में लॉक-इन के कारण निवेशक आसानी से बाहर नहीं निकल पाते, इसलिए लागत पर नियंत्रण निवेशक सुरक्षा के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

निवेशकों के लिए इसका वास्तविक मतलब

खर्च में कमी छोटी लग सकती है, लेकिन लंबे समय में कंपाउंडिंग की वजह से बड़ा फर्क कर सकती है।

उदाहरण के तौर पर, 10 लाख रुपये के लंपसम निवेश पर केवल 0.20% (20 bps) एक्सपेंस रेशियो कम होने से, मान लें 12% CAGR (एक्सपेंस से पहले) और 1.5% के खर्च के आधार पर, लगभग:

  • 10 साल में लगभग ₹50,000 के आसपास अतिरिक्त लाभ संभव हो सकता है।
  • 20 साल में यह लाभ करीब ₹2.7 लाख तक पहुंच सकता है।

यानी समान रिटर्न मानते हुए, कम खर्च वाला फंड आपके लिए अधिक नेट रिटर्न पैदा कर सकता है, क्योंकि हर साल बचा हुआ खर्च भी आगे बढ़कर रिटर्न कमाता है।

SIP तभी काम करती है जब सही फंड चुना जाए। गलत फंड में की गई SIP सालों की मेहनत बेकार कर सकती है। मैं AMFI Registered MFD (ARN 317145) हूँ। आपके लक्ष्य और रिस्क के हिसाब से सही फंड + सही SIP चुनने में मदद करता हूँ। अगर आप SIP शुरू करना चाहते तो अभी रजिस्टर करें और सही शुरुआत करें।

क्या अब सिर्फ कम Expense Ratio वाले फंड चुनें?

केवल कम एक्सपेंस रेशियो देखकर फंड चुनना समझदारी नहीं है। कम खर्च सिर्फ एक फैक्टर है, पूरा निर्णय नहीं।

फंड चुनते समय इन बातों पर भी ध्यान देना जरूरी है:

रिटर्न की क्वालिटी:

  • क्या फंड ने 5–7 साल में अलग–अलग मार्केट साइकिल में स्थिर और बेहतर रिटर्न दिए हैं?
  • केवल एक-दो साल की आउटपरफॉर्मेंस को आधार न बनाएं।

रिस्क मेट्रिक्स:

  • स्टैंडर्ड डिविएशन, शार्प रेशियो, डाउनसाइड रिस्क, मैक्स ड्रॉडाउन जैसे पैरामीटर देखें।
  • समान कैटेगरी के अच्छे फंड्स से तुलना करके देखें कि रिस्क के हिसाब से रिटर्न कैसा है।

पोर्टफोलियो क्वालिटी:

  • टॉप 10 स्टॉक्स, टॉप 5 सेक्टर्स, कंसन्ट्रेशन, पोर्टफोलियो टर्नओवर आदि पर नजर रखें।
  • क्या फंड स्टाइल कंसिस्टेंट है (जैसे true large cap, pure mid cap) या बार–बार बदलता है?

फंड मैनेजमेंट टीम:

  • फंड मैनेजर का अनुभव, टीम की गहराई, और निवेश प्रक्रिया कितनी स्पष्ट और डिसिप्लिन्ड है।

AUM प्रबंधन:

  • बहुत बड़ा AUM कई बार मिड/स्मॉल कैप फंड्स में रिटर्न को दबा सकता है, वहीं बहुत छोटा AUM लिक्विडिटी रिस्क पैदा कर सकता है।

फंड का एक्सपेंस रेशियो उसकी परफॉर्मेंस को जस्टिफाई करना चाहिए। यानी यदि फंड एक्टिव मैनेजमेंट के नाम पर ऊंची फीस ले रहा है, तो उससे उम्मीद की जाए कि वह लंबे समय में बेंचमार्क और कैटेगरी से बेहतर रिस्क–एडजस्टेड रिटर्न दे।

क्या कम एक्सपेंस देखकर फंड स्विच कर देना चाहिए?

हर बार थोड़ा कम एक्सपेंस देखकर फंड स्विच करना जरूरी नहीं, बल्कि कई बार नुकसानदेह भी हो सकता है।

यदि आपका मौजूदा फंड:

  • लंबे समय में लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहा है,
  • आपके गोल, रिस्क प्रोफाइल और एसेट एलोकेशन के हिसाब से फिट बैठता है,
  • और उसकी पोर्टफोलियो क्वालिटी मजबूत है,
    तो सिर्फ 0.10–0.20% कम एक्सपेंस के लिए स्विच करना जरूरी नहीं।

बार–बार स्विच करने से:

  • टैक्स लग सकता है (कैपिटल गेन),
  • एग्जिट लोड लग सकता है,
  • और आपके पोर्टफोलियो की स्थिरता और कम्पाउंडिंग पर असर पड़ सकता है।

कम एक्सपेंस रेशियो का सही उपयोग यह है कि:

  • जब दो फंड्स की परफॉर्मेंस, रिस्क प्रोफाइल और पोर्टफोलियो क्वालिटी लगभग समान हो,
  • तब कम एक्सपेंस वाला फंड बेहतर विकल्प माना जा सकता है, क्योंकि वही स्ट्रक्चर कम लागत पर मिल रहा है।

निवेशक क्या करें?

SEBI की इस पहल का उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना और निवेशकों की सुरक्षा मजबूत करना है, लेकिन आपके लिए मुख्य फोकस अभी भी यही होना चाहिए कि फंड:

  • आपके फाइनेंशियल गोल्स (रीटायरमेंट, बच्चों की एजुकेशन, घर खरीदना आदि) के साथ अलाइंड हो।
  • आपके रिस्क प्रोफाइल के अनुसार हो (कंज़र्वेटिव, मॉडरेट, एग्रेसिव)।
  • पर्याप्त समयावधि (टाइम होराइजन) के साथ चुना जाए।

सही तरीका यह है कि:

  • पहले गोल, समय और रिस्क के आधार पर सही एसेट एलोकेशन और कैटेगरी चुनें (लार्ज कैप, फ्लेक्सी कैप, मिडकैप, डेbt, हाइब्रिड आदि)।
  • फिर कैटेगरी के अच्छे और कंसिस्टेंट फंड्स की सूची बनाएं।
  • उन फंड्स में से जिनकी परफॉर्मेंस और पोर्टफोलियो क्वालिटी पास–पास है, उनमें कम एक्सपेंस रेशियो वाले विकल्प को प्राथमिकता दें।

नया नियम आपके लिए एक अतिरिक्त फायदा है – आपको अब यह ज्यादा साफ दिखेगा कि असली फंड मैनेजमेंट की लागत कितनी है और टैक्स/ट्रांजैक्शन कॉस्ट कितना है। इससे तुलना करना, गलतफहमी दूर करना और सही प्रोडक्ट चुनना पहले से आसान हो जाएगा।

सोच–समझकर, प्लानिंग के साथ और लंबे समय के नजरिए से किए गए निवेश के साथ यह लागत कटौती आपकी वेल्थ क्रिएशन जर्नी को और मजबूत बना सकती है।

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Disclaimer: म्यूचुअल फंड निवेश बाज़ार के जोखिमों के अधीन हैं। निवेश करने से पहले सभी स्कीम संबंधित दस्तावेज़ ध्यान से पढ़ें। पिछला प्रदर्शन भविष्य के रिटर्न की गारंटी नहीं देता। बाज़ार स्थितियों के अनुसार निवेश का मूल्य बढ़ भी सकता है और घट भी सकता है। किसी भी निवेश से पहले अपने जोखिम स्तर, निवेश अवधि और आवश्यकता अनुसार वित्तीय सलाहकार की राय ज़रूर लें।

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